मातृत्व की राह में मेरी पहली हमसफ़र

मेरी शादी हुई तब मैं २२ साल की थी, पहला बच्चा २५ में हुआ| माँ बनने की उत्सुकता तो बहुत थी पर उसके साथ आने वाली जिम्मेदारियों का पूरी तरह एहसास नहीं था| हर बच्चे के साथ ही एक माँ भी जन्म लेती है|

बच्चे की डिलीवरी नार्मल हुई, और जैसा की मैंने पढ़ा और सुना था, माँ का पहला गाढ़ा दूध यानी कोलोस्ट्रम बच्चे की तुरंत पिलाना होता है, वह तक तो सब ठीक रहा पर कुछ ही घंटों में मेरा बच्चा काफी रो रहा था, तब मैंने जाना की इंसान भूख की भावना पैदा होते ही समझने लगता है| नवजात शिशु के लिए स्तनपान करना अत्यावश्यक होता है|जैसे हर बच्चा दूसरे से अलग होता है वैसे ही उसके पालन पोषण में आने वाली चीज़े भी अलग-अलग होती है| पर सबसे सामान्य तौर पर शिशु को स्तनपान करने में असफल माताओं की समस्या होती है|अस्पताल की डॉक्टर की राय से हमने बेबी के लिए टॉप फीड यानी ऊपरी दूध शुरू किया, अब मुझे और बेबी को अस्पताल से छुट्टी मिल गयी थी और हम घर आ गए. घर रिश्ते दारों से भरा हुआ था| पहला बच्चा होने की वजह से दादा-दादी, नाना-नानी, मामा, बुआ सब लोग इकठ्ठा हुए थे|

पर मैं किसी और ही उलझन में थी, मैं अपने बच्चे को पूरी तरह पोषण नहीं दे पा रही थी, बच्चे के लिए कम से कम जन्म से छह महीने तक केवल माँ का दूध ही पोषण का आधार होता है| स्तनपान से केवल बच्चे के नहीं बल्कि माँ के सेहत पर भी काफी प्रभाव पड़ता है| माँ और बच्चे का भावनात्मक बंधन और भी घनिष्ठ हो जाता है| बच्चे का पेट नहीं भर रहा है इस बात की चिंता तो मुझे थी ही पर घर के बाकी लोग जो दबाव और ताने कास रहे थे उससे कई बार तो मुझे बच्चे को उठाने का भी मन नहीं करता था| ऐसा नहीं की वो सब मुझसे प्यार नहीं करते थे, पर बच्चे का रोना किसी से बर्दाश्त नहीं हो रहा था| क्या पता वह “पोस्ट पॉर्टम डिप्रेशन” था या मैं माँ होने के बावजूद अपने बच्चे का सही तरीके से पोषण नहीं कर पा रही हूँ इस बात का गम, पर मेरा दूध आना और भी काम हो रहा था| मेरी इस उलझन को समझ कर हमने डॉक्टर की सलाह लेने का सोचा, तब डॉक्टर ने हमे झंडू के स्त्रिवेदा के बारे में बताया, ये न ही केवल नेचुरल है पर पूरी तरह से शाकाहारी भी है. इसका प्रमुख घटक है सदियों से जानामाना “शतावरी”. शतावरी एक जानी पहचानी जड़ी-बूटी (हर्ब) है जो दुग्धपान करने वाली माँ का स्तनों में दूध की मात्रा बढ़ा देता है, और माँ को आवश्यक प्रोटीन भी मिलता है| शतावरी के सेवन से प्राेलैक्टिन हारमोन की मात्रा काफी बढ़ जाती है तो मेरे जैसे कई मांओं को जिनका दूध बनता ही नहीं है या कम बनता है उनके लिए ये झंडू का स्त्रिवेदा बहुत ही उपयुक्त और आवश्यक उत्पाद है| और यहाँ प्राकृतिक होने की वजह से इसका कोई दुष्परिणाम भी नहीं है|

डॉक्टर की सलाह के बाद मेरे पति ने ऑनलाइन इसको आर्डर किया. एक दो दिन में ही मुझे फरक पता चलने लगा| अब अगर मेरा बेटा रोने भी लगता, तो उसकी दादी को भी पता था की वह भूख से नहीं किसी और कारण से रो रहा है| धीरे धीरे मैं भी अपने बच्चे को संभालना सीख गयी| जब बच्चे का पेट अच्छे से भरा हो तो समझो आधी लड़ाई आपने जीत ही ली| जब दफ्तर वापस जाने का टाइम हुआ तब भी मुझे कोई परेशानी नहीं हुई| बच्चे के लिए अपना दूध “ब्रैस्ट पंप” की मदत से आराम से निकल कर बॉटल में रख देती थी, ताकि दिन भर उसे कोई परेशानी ना हो|मै तो हर नयी माँ के लिए स्त्रिवेदा अपनाने की सलाह देती हूँ| इससे मुझे अपने मातृत्व के नए सफर में एक नयी सहेली मिली, जिसने मेरी राह आसान बनायीं|

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